लोकतंत्र, नागरिक भागीदारी और राष्ट्रहित: 21वीं सदी में सावरकर की वैचारिक प्रासंगिकता
Seetu Shukla, Prof.Dr. Aditya Singh
शोध सार लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं बल्कि नागरिक चेतना, सहभागिता और राष्ट्रहित के प्रति उत्तरदायित्व की सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि है। 21वीं सदी में, जब वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, पहचान की राजनीति और राष्ट्र-राज्य की चुनौतियाँ तीव्र हो रही हैं, तब लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और राष्ट्रीय हित के साथ उनके नैतिक संकल्प पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में वीर विनायक दामोदर सावरकर की वैचारिक प्रासंगिकता का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। सावरकर का राष्ट्रवाद भावनात्मक या संकीर्ण न होकर सक्रिय, तर्कसंगत और कर्तव्य प्रधान है। वे स्वतंत्रता को केवल अधिकारों की प्राप्ति तक ही सीमित नहीं रखते है, बल्कि राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन से जोड़कर देखते थे। उनके अनुसार लोकतंत्र तभी सशक्त हो सकता है जब नागरिक केवल मतदाता न रहकर राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनें। आज के संदर्भ में यह विचार नागरिक उदासीनता, राजनीतिक निष्क्रियता और केवल अधिकार-आधारित विमर्श की सीमाओं को उजागर करता है। 21वीं सदी में लोकतंत्र की सफलता केवल संस्थागत संरचनाओं पर नहीं बल्कि जागरूक नागरिक भागीदारी और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में वीर सावरकर के विचार लोकतंत्र को केवल शासन पद्धति नहीं बल्कि नागरिक कर्तव्य और राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। यद्यपि सावरकर को प्रायः राजनीतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखा गया है किंतु लोकतंत्र और नागरिक सहभागिता के प्रति उनकी वैचारिक दृष्टि पर तुलनात्मक और समकालीन अध्ययन अपेक्षाकृत सीमित है, यह शोध इस वैचारिक रिक्तता को भरने का प्रयास करता है।