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Shree Krishna International Journal of Multidisciplinary Studies

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Browse articles from our most recent issue — Vol. 1, No. 1, published April - June 2026. Each paper has been double-blind peer reviewed and is freely available under open access.

Vol. 1 · No. 1 April - June 2026
9 Articles 1–67 pp
Social Sciences

लोकतंत्र, नागरिक भागीदारी और राष्ट्रहित: 21वीं सदी में सावरकर की वैचारिक प्रासंगिकता

Seetu Shukla, Prof.Dr. Aditya Singh

शोध सार लोकतंत्र मात्र एक शासन-प्रणाली नहीं बल्कि नागरिक चेतना, सहभागिता और राष्ट्रहित के प्रति उत्तरदायित्व की सम्पूर्ण जीवन-दृष्टि है। 21वीं सदी में, जब वैश्वीकरण, तकनीकी क्रांति, पहचान की राजनीति और राष्ट्र-राज्य की चुनौतियाँ तीव्र हो रही हैं, तब लोकतंत्र की सफलता नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और राष्ट्रीय हित के साथ उनके नैतिक संकल्प पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में वीर विनायक दामोदर सावरकर की वैचारिक प्रासंगिकता का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक हो जाता है। सावरकर का राष्ट्रवाद भावनात्मक या संकीर्ण न होकर सक्रिय, तर्कसंगत और कर्तव्य प्रधान है। वे स्वतंत्रता को केवल अधिकारों की प्राप्ति तक ही सीमित नहीं रखते है, बल्कि राष्ट्रीय दायित्वों के निर्वहन से जोड़कर देखते थे। उनके अनुसार लोकतंत्र तभी सशक्त हो सकता है जब नागरिक केवल मतदाता न रहकर राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनें। आज के संदर्भ में यह विचार नागरिक उदासीनता, राजनीतिक निष्क्रियता और केवल अधिकार-आधारित विमर्श की सीमाओं को उजागर करता है। 21वीं सदी में लोकतंत्र की सफलता केवल संस्थागत संरचनाओं पर नहीं बल्कि जागरूक नागरिक भागीदारी और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में वीर सावरकर के विचार लोकतंत्र को केवल शासन पद्धति नहीं बल्कि नागरिक कर्तव्य और राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर देखने की दृष्टि प्रदान करते हैं। यद्यपि सावरकर को प्रायः राजनीतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में देखा गया है किंतु लोकतंत्र और नागरिक सहभागिता के प्रति उनकी वैचारिक दृष्टि पर तुलनात्मक और समकालीन अध्ययन अपेक्षाकृत सीमित है, यह शोध इस वैचारिक रिक्तता को भरने का प्रयास करता है।

pp. 1–6 PDF
Medical

FROM WOMB TO ECONOMY: ANTIBIOTIC OVERUSE IN PREGNANCY and ITS PSYCHOLOGICAL AND ECONOMIC IMPLICATIONS

Trapti Shukla

While pregnancy is a transformative period of maternal health, the clinical management of sepsis through antibiotics requires careful oversight. To treat maternal and fetal infections, the authorised clinicians prescribe antibiotics. However, the growing practice of self medication with antibiotics for treating any kind of minor infections without a prescription has led to a concerning rise in self-medication. Evidence suggests that taking over-the-counter medicines can be harmful for not only to the mother but also the psychological development of the baby and the economic structure of the family. This study adopts a qualitative secondary literature review to examine the psychological, clinical and economic implications of antibiotic overuse during pregnancy. Relevant data was collected from reliable academic sources. Special attention was given to studies discussing the impact of antibiotics on the gut brain axis and the growing issue of antimicrobial resistance because antibiotics disrupt the maternal and fetal microbiota. A comparative and analytical framework was employed to synthesize data regarding clinical outcomes and socio-economic variables. The findings of the study shows that antibiotic overuse during pregnancy has a significant psychological, clinical and economic effects. Research suggests that prenatal exposure to antibiotics may disturb the gut brain axis which can affect the psychological development and lead to behavioral or cognitive issues in children and the high cost of antimicrobial resistance (AMR) can lead to economic crises for the family as well.

pp. 7–13 PDF
Commerce

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार: चुनौतियां और अवसर

सौरभ अवधेश पाठक

इस शोध पत्र का उद्देश्य विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना के बाद ताइवान की व्यापारिक, आर्थिक एवं प्रशासनिक नीतियों में हुए परिवर्तनों का अध्ययन करना है। वैश्वीकरण और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के बढ़ते प्रभाव के साथ ताइवान को अपनी आर्थिक नीतियों, व्यापार नियमों तथा घरेलू कानूनों में महत्वपूर्ण सुधार और समायोजन करने पड़े। WTO की सदस्यता प्राप्त करने के लिए ताइवान ने अपने राष्ट्रीय कानूनों और व्यापारिक व्यवस्थाओं को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों के अनुरूप बनाने का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप उसकी अर्थव्यवस्था और व्यापारिक संरचना में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले। इस अध्ययन में ताइवान के बाहरी एवं आंतरिक समायोजनों, आर्थिक उदारीकरण, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तथा WTO प्रणाली में उसके एकीकरण की प्रक्रिया का विश्लेषण किया गया है। साथ ही यह भी अध्ययन किया गया है कि इन परिवर्तनों का ताइवान की अर्थव्यवस्था, व्यापार क्षेत्र, घरेलू उद्योगों तथा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ा। शोध से स्पष्ट होता है कि WTO सदस्यता ने ताइवान को वैश्विक व्यापार व्यवस्था में एक मजबूत पहचान प्रदान की, किन्तु इसके साथ उसे कई आर्थिक, नीतिगत एवं प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा।

pp. 14–23 PDF
Interdisciplinary

भाषा का मानसिक प्रभाव: एक सांस्कृतिक और वैचारिक अध्ययन

Dr. Neelam Tandon

यह शोधपत्र भाषा के मनोवैज्ञाननक प्रभावए साांस्कृ नतक चेतना तथा धानमिक.ऐनतहानसक नवमशि के पारस्पररक सांबांधोां का नवश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह प्रनतपानदत नकया गया है नक भाषा के वल सांप्रेषण का माध्यम नहीांए बल्कि व्यल्कि एवां समाज की मनोवृनत्तयोांए साांस्कृ नतक धारणाओां तथा वैचाररक सांरचनाओां को प्रभानवत करने वाली शल्कि भी है। लेख में नवनभन्न ऐनतहानसकए धानमिक एवां भाषायी उदाहरणोां के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास नकया गया है नक सांस्कृ त एवां वैनदक परांपराओां का प्रभाव नवश्व की अनेक सांस्कृ नतयोांए पांथोां और भाषाओां पर देखा जा सकता है। नवशेष रूप से ईसाईए इस्लामीए बौद्धए जैन एवां नसख परांपराओां के सांदभि में लेखक ने यह तकि प्रस्तुत नकया है नक इनकी अनेक अवधारणाएाँए कमिकाांड एवां शब्दावली भारतीय वैनदक.सांस्कृ त परांपरा से सांबद्ध हैं। साथ हीए पनिमी नवद्वानोां द्वारा भारतीय सांस्कृ नत एवां इनतहास की व्याख्या में उत्पन्न भ्रम तथा उसके मनोवैज्ञाननक प्रभावोां की भी समीक्षा की गई है। शोध का ननष्कषि यह है नक भाषाए सांस्कृ नत और धमि का सांबांध गहन मनोवैज्ञाननक आधार पर नननमित होता है तथा भाषायी व्याख्याएाँ सामानजक चेतना एवां ऐनतहानसक दृनष्टकोण को दीर्िकालीन रूप से प्रभानवत करती हैं।

pp. 24–31 PDF
Data Science

कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौतियाां एवां सुझाव

डॉ०रघुबीर सिंह

कृत्रिम बुद्धिमत्ता Artificial Intelligence-At) वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे प्रभावशाली तकनीकी परिवर्तनों में से एक है। 47 ने उत्पादन, सेवा, शिक्षा स्वास्थ्य बैंकिंग तथा औद्योगिक क्षेत्रों में कार्य करने की प्रक्रिया को बदल दिया है। इसका प्रभाव रोजगार के अवसरों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में दिखाई देता हे । एक चोर Al ने उत्पादकता नवाचार और नए रोजगार क्षेत्र को बढावा दिया है, वहीं दूसरी और पारंपरिक नौकरियों में कमी, कोरल असमानता तथा श्रम बाजार में अनिश्चितता को जन्म दिया है प्रस्तुत शोध पर में Al के आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण करते हुए रोजगार सृजन, रोजगार विस्थापन कोरल विकास तथा भारत के श्रम बाजार पर इसके प्रभावों का अध्ययन किया त्या है अध्ययन से स्पष्ट होता हे कि Al पूर्णतः रोजगार समाप्त करने वाली तकनीक नहीं हे बल्कि यह रोजगार के स्वरूप को परिवर्तित करने वाली तकनीक है। अतः सरकार, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों के समन्वय से कौशल उन्नयन एवं नीति निर्माण आवश्यक हैं।

pp. 32–38 PDF

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